Tuesday, September 21, 2010

जैसे-तैसे


कि जैसे-तैसे मैं आ गया इस बीच
कि अब जैसे-तैसे ही बड़ा हो जाऊँगा,
उन जैसे-तैसों के बीच रहकर
कि जैसे-तैसे दिन गुज़ार कर
मैं भी लूँगा जैसे-तैसे एक दिन अपनों से विदा,
बाकी पीछे छूट गए जैसे-तैसों की तरह ही
कि आह, मैं भी इक जैसे-तैसे चल रहे देश की
इक जैसी-तैसी संतान कहलाऊंगा
नहीं जानता
पर चाहता हूँ
कि जैसे-तैसे सही
यह सूरत
आगे आने वालों के लिए
बदली-बदली सी हो
ताकि न आये फिर इस बीच
मुझ जैसा कोई जैसा-तैसा |

Friday, September 10, 2010

क्षणिका


वह देखो ,
गाडी में बैठी उस महिला को
उसकी गाडी पेट्रोल से चलती है
और मेरी
मेरे खून से
पर वह
मेरे अस्तित्व को
सड़कों पर बनाये रखने की
लड़ाई लड़ रही है
क्या कभी
बतौर इंधन
फूंकते मेरे खून के
विकल्प की लड़ाई
वो लड़ेगी ,
पता नहीं |

Thursday, September 9, 2010

भाषा

श्री देवी प्रसाद मिश्र जी की एक लम्बी कविता 'भाषा' की कुछ पंक्तियाँ |
..नवउदारवाद को मैंने ठुकरा रखा है और विचारधारा की एक दुकान भी खोल रखी है जिसमे नमक हल्दी तो है लेकिन बिकता हल्दीराम है - भारतीय आदिवास को पिंजरे में बंद कर एमसटरडम में परचा पढने जाने का मेरा कोई एजेंडा नहीं था और मेरे पास सत्ता का आधे फुट का डंडा नहीं था न ही मैंने यह माना की भारतीय ग्राम आधिपत्य और अधीनता के वधस्थल नहीं थे - वहां शूद्र था और उसका परपीड़क ब्राह्मण था | यह स्मृति का वीभत्स था | जो बेदखल की तमतमाई अक्ल है उसे आप कहते हो की नक्सल है | आदमी की नस्ल हूँ - फ़स्ल हूँ जिसे आप रोज़ उजाड़ते हो | और मेरी दौक्यूमेंट्री की सेलेक्टिव क्लिपिंग लेकर मेरा चेहरा बिगाड़ते हो | यह एडिटिंग की राजनीति है - क्या दिखाया जाय और क्या नहीं का आधिपत्य | और उसके बाद चल गणपत ज़रा दारु ला की पस्त पुकार का देश व्यापी सामान वितरण ..

Thursday, July 8, 2010

मेरी जाति हिन्दुस्तानी




अभी कुछ दिनों पहले साहित्य अकादमी के सभागार में'सबल भारत' के बैनर तले 'मेरी जाति हिन्दुस्तानी' पर एक परिचर्चा वेद प्रताप वैदिक जी ने आयोजित की थी | राजनेताओं से निराश प्रबुद्ध वर्ग की तरफ से आयोजित इस चर्चा में कई नामचीन लोगों ने अपनी राय दी | एक तरफ जहाँ नामवर जी ने इसे साहित्य की समस्या न मानते हुए एक राजनीतिक समस्या और वामपंथियों में भी जाति पर आधारित चुनाव लड़े जाने की बात कही वहीँ अकादमी के उपाध्यक्ष महोदय ने उसी दिन सुबह उनके पास इसी कार्यक्रम को ले कर आए एक फ़ोन का ज़िक्र किया | उन्होंने बताया की आज सुबह ही कुछ दलित दोस्तों का फ़ोन उनके पास आया जिसमे उन लोगों ने विषय को लेकर अपनी दो आपतियां जाहिर की | सबसे पहले उन लोगों ने ऐसी परिचर्चाओं पर आपत्ति ज़ाहिर करते हुए कहा कि वह यह चाहते हैं कि जनसँख्या के दौरान जाति के कॉलम को लोग अवश्य भरे साथ ही दलितों को तो खास तौर पर इस पर ध्यान देना होगा | दूसरी बात जो उन्होंने कही वो यह कि 'मेरी जाति हिन्दुस्तानी' में जो हिन्दुस्तानी शब्द है उसमें हिन्दू शब्द जुड़ा हुआ है जो एक खास वर्ग के लोगों तक ही इशारा करता है |

अब इस तरह कि बातें तो यह साफ़ ज़ाहिर करती हैं कि जाति आज हमारे छाती में शूल कि तरह कैसे गहरी धंसी हुई हैं | परिचर्चा के दौरान एक बात जो मुझे बेहद अच्छी लगी वो यह कि वैदिक जी ने अपने वक्तव्य के दौरान उन जातियों का ज़िक्र किया जो हासिए पर , विलुप्त होने के कगार पर और संकटग्रस्त हैं | पर वो आगे कुछ और इस बारे में बोलते उन्होंने बीच में ही अपनी बात अधूरी छोड़ दी | वैदिक जी का अधूरा वाक्य बिलकुल उन जातियों के जीवन में व्याप्प्त अधूरेपन की तरह ही था | पर उनकी इस बात ने यह तो साफ़ कर ही दिया कि ऐसी जातियों , उनकी बोलियों और उनकी संस्कृति जो विलुप्त होने के कगार पर उपेक्षित और हर दृष्टि से संकटग्रस्त हैं उन्हें बचाए रखने के लिए उनके अंकेक्षण कि जरुरत कहीं ज्यादा है | मेरी गुजारिश है वैदिक जी से कि वे अपने इस आन्दोलन में इसे प्राथमिक स्वर दें |

तस्वीर गूगल से साभार

Sunday, June 20, 2010

कल झुलसा था कोई !


मैंने बनाए हैं
कई अपरचित चेहरों को दोस्त यहाँ
पर यह न जान पाया
की कल देर रात
मेरे पड़ोस में लगी आग
जिसमे झुलसे थे तीन चेहरे
वो जलने से पहले कैसे दिखते थे |
कि अब भी न जान पाया की
कल उस घर से देर रात
क्यों आ रही थी
एक छोटी सी बच्ची के बिलखने की आवाज़ |
कि आज सुबह मुझे पता चला की
वो आवाज़ उसी लड़की की थी
जिसे रोज देखा करता था बाग़ में खेलते हुए इधर-उधर |
कि आज सवेरे यह जान पाया की
मेरे पास में लगी उसी आग में
वो बच्ची भी जलकर मर गई|
कि आज यह जान पाया की
मेरे बगल के उस परिवार ने
कई दिनों से आर्थिक बदहाली से जूझते हुए
कल रात बेबस हो कर झोंक दिया था
खुद को आग में |
कि अभी-अभी मुझसे एक और 'दोस्त' जुड़ा है
और
अब मेरे दोस्तों की संख्या अस्सी हो गई है |
कि अब भी मैं नहीं जानता की
मेरे बगल में
और
कौन रहता है |

Tuesday, June 15, 2010

मेरे शहर का नाम


'भोपाल गैस त्रासदी' की भयावहता राजेश जोशी की कविता और पाब्लो बर्थोलोमेव की तस्वीर के जरिये
मेरे शहर का नाम

मैं नहीं चाहता
कि जब भी लूँ
मैं अपने शहर का नाम
दूसरा पूछे
क्या हुआ था
उस रात?
कैसे हुआ वह सब कुछ?
मुझे आज तक कोई नहीं मिला

जिसने कहा हो

मैं हिरोशिमा से आया हूँ
मैं आया हूँ नागासाकी से

क्या मुँह लेकर जाऊँ
मैं दूसरों के सामने?
किस मुँह से कहूँ
कि मैं आया हूँ
किस शहर से !

Wednesday, June 2, 2010

तसल्ली देता हूँ खुद को !


नहीं पता मुझे कि आखिर कौन सा संबोधन लगा उसे बधाई दूँ "| नहीं पता मुझे| फिर सोचता हूँ - ' भला है यह संबोधन भी लगाये जाने के बंधन से मैं मुक्त हूँ | मुक्त रहते हुए उस मीठे झण कि तन्हाइयों में एक बुनकर ही सही अपने सपनों को मैं एक आकर देने कि कोशिश करता हूँ | इधर इच्छाएं भी लगातार पैदा हो रही हैं, पर पूरी एक भी नहीं होती| अब तो तसल्ली देता हूँ खुद को कि 'ठीक ही तो है कि वो पूरी नहीं होती | आखिरकार इच्छाओं के पैदा होने कि ख़ुशी उनके पूरा हो जाने के साथ ही दम भी तो तोड़ देती हैं'| अब तो 'अन्दर' दूर-दूर तक फैले लहकते रेत की मृगमरीचिका में भटकना भी अच्छा लगता है| क्या कहूँ ?